Monday, 14 January 2013

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वो जो कैद है अरसे से पलकों में 
वो रात आज की रात आज़ाद होगी 

मुट्ठी भर सुबह को ढून्ढ लाये हैं,
रौशनी से एक नयी इब्तिदा आज होगी 

नहीं रोकेंगे अबके लहर-ऐ-अलफ़ाज़ को हम बेरहमी से 
बात निकलेगी तो हर बात पे बात होगी 

हम तो हर बात को कागज़ पर उतार लेते हैं 
तुम शायर न सही, पर कोई तो बात मेरी तुमको भी याद होगी

लब पर न उतारी तूने कोई शिकन, ये तेरी फ़ज़ल 
शिकायतें तुझको भी मुझसे बेहिसाब होगी 

आधे आधे लफ़्ज़ों की भी एक कहानी है 
उतरेगी कागज़ पर तो कोई ग़ज़ल इजाद होगी 


लहर-ऐ-अलफ़ाज़- flow of words,  फ़ज़ल - grace

5 comments:

  1. Bahut sundar afsana hai.
    Waqt ke saath alfaaz kahi kho jaate hai, magar apni khushbu ko zehen me sada ke liye basa jaate hai.
    To shabdo ko piro kar aise fasane banate rahiyega

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  2. Am falling short of words here...wow...I do not know how many times I will read this...Priyanka, this too good!

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    1. Thankyou so much Rupa :) Your words make me happy!
      Though I am more curious to know how exactly you landed here?
      Stay around!

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  3. :) I have sent you a message on FB..The one whose link you have given here

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